Monday, October 22, 2007

हे मनुष्य, तुम्हारा क्या कारण है?

साधारण से परे, विज्ञप्त से पृथक,
तुम्हारी अन्तर ज्वाला का विवरण,
हे मनुष्य, तुम्हारा क्या कारण है?

अथाह आशाओं पर निलंबित अंकुश,
सतह त्रुटी मे विलुप्त वो स्मरण,
हे मनुष्य, तुम्हारा क्या कारण है?

पहल, कदमों तले धरा खिसकाने की,
सिसकती अनवरत अपेक्षाओं का रण,
हे मनुष्य, तुम्हारा क्या कारण है?

निरंतर स्मृतियों पर ठहरे संकोच,
रुधिर लिप्त पथो के कण-कण,
हे मनुष्य, तुम्हारा क्या कारण है?

निराश! विजय! स्वयं के स्वामी!
धूमिल रेखाओं का अंजलि चित्रण!
हे मनुष्य, तुम्हारा क्या कारण है?

-अनुभव

2 comments:

  1. anubhav ke kalam se likha har ek sabd apni jagah pata hai.......tum bemisal ho guru

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  2. I can't understand the meaning of this writing either, although it looks very beautiful.

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