क्या व्याख्या करू मैं इस संसार की?
कुछ अजब सी स्थिर इस मझधार की
शुरु से जो हो रहा है मुक्कम्मल
उस संताप की, सुरूर की, प्रहार की..
हर प्रारंभ के कोने में छुपते से
बेवजह छपते हुए इश्तेहार की
और अँधेरे में बैठे चुप से
बेबात की बात के उस सार की..
जिसकी तलाश है मेरे दोस्त को
वक्त की बुझती हुई उस मार की
जिसके थपेड़े आज भी हुंकारते
अफ़सोस के माहौल के उस तार की
आखिर चला जो आखिरी था आदमी
मन के उसके कौंधते विचार की
मशगूल जो अपनी तरह से हो रही
ऐसी ही एक बहकी हुई सी हार की
शाम को गोधुली में खोती हुई
एक आदमी की कोशिश एक बार की
क्या व्याख्या करू मैं इस संसार की?
कुछ अजब सी स्थिर इस मझधार की...
- अनुभव
Sunday, March 29, 2009
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