Search This Blog

Loading...

Friday, April 3, 2009

गौरव को संभाव्य करो

एक वचन सच करो मनुज
कुछ अर्थ गहो शब्दों में अब
सब व्यर्थ नहीं ऐसा सोचो
कुछ आग भरो कंधो में अब

नमन नहीं हुंकार करो तुम
दान नहीं तुम दमन करो अब
बनता है बारूद सच शून्य ही
अपने सूक्ष्मकार से नहीं डरो अब

जब समानता मिले नहीं सहज
अंतरद्वंद्व पर संयम करो तब
क्रोध केन्द्रित करो शत्रु पर
विजय पताका हाथ धरो तब

पीताम्बर नहीं लाल रंगों मुह
विचार नहीं युद्ध करो अब
अंतिम बार अंतिम साँसों में
गौरव को संभाव्य करो अब...

- अनुभव

0 comments:

Post a Comment