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Tuesday, September 22, 2009

मनुष्य हो ये ख्वाब है

मनुष्य ही तो हूँ मगर पवन बनूँ ये ख्वाब है
चले तो आंधियो सा मन, रुके तो आफताब है,
अलग अलग तरफ सही, अलग थलग सी लग रही,
इस ज़िन्दगी की रात में एक आदमी ही आब है...

जो मन से ही अनंत है, जो खुद का ही खिताब है,
समय के इस ठैराव में, जो एक ही सैलाब है,
फ़िक्र नहीं जिसे की वो मरे, जिए या गिर पड़े,
वो वक़्त के सवाल का मुंह तोड़ सा जवाब है...

जिसकी बात सोच कर, चाँद तक बेताब है,
अक्स के वज़न सी ही, समुन्द्र इज्तानाब है,
ख़याल जिसका कर के ही पहाड़ बढ़ नहीं सके,
सांस जिसकी चलने सी पल भागता शिताब है,

समस्त ताकतों का वो एक इज़तेराब है,
खुले हुए गगन को भी जो नापता हिसाब है,
वो ही तो है जो आज तक बना नहीं सके हैं हम,
आदमी बहुत से हैं, मनुष्य हो ये ख्वाब है...


- अनुभव

1 comments:

  1. मनुष्य हो ये ख्वाब है...
    'wow I like it
    ReplyDelete