Tuesday, September 29, 2009

उनकी ज़बान को पानी चाहिए

आज फिर तुम आये हो कुछ सपने बेचने,
पर तुम ये समझ नहीं पाते हो आज भी,
की तपतपाती धूप में इन भूखे लोगों को,
तुम्हारी हर बात एक सपना ही लगती है
उनकी हकीकत तुम्हारी हकीकत से बहुत दूर
अकेले बेचैन सी खड़ी है और चुप चाप
तुमको देख कर कुछ बोलना भी चाहती है -
पर उनकी ज़बान को आवाज़ नहीं पानी चाहिए...

तुम सोचते हो की आंसुओं पर पानी फेंक कर,
उनके दुःख को बहा दोगे और वो मुस्कुराएंगे,
तुम्हारे नंगे इश्तिहारों में उनके चेहरे,
कुछ बिकने योग्य संवेदना दिखलायेंगे,
जिसको बेचकर तुम्हारे ये सफेदपोश साथी,
तुम्हारे लिए एक अतुलित राज्य बना देंगे,
और फिर तुम्हे यहाँ इस मायूस से गाँव में,
इन भूखों के बीच बैठना नहीं पड़ेगा...

आज तुम एक बोरी चावल से खरीदोगे,
इनकी भूख, इनकी सोच और इनके वोट को,
पर तुम जानते नहीं हो की भूखे पेट,
सोचना कितना मुश्किल और बेवजह लगता है,
और शायद आज ये सब बिक भी जायेंगे,
इनकी मजबूरी ही ऐसी है और फिर कल,
जब तुम आराम से फलो का आहार करोगे,
तब ये लोग फिर से भूखे बैठे तरसेंगे...

और फिर भूख में भी ये सोचने लगेंगे,
की तुम झूठे थे, कोई भगवान् नहीं,
हर पल ही ये तुम्हारा तिरस्कार करेंगे,
और अगली बार ये चावल तो शायद ले लें,
पर ये बिकेंगे नहीं इतना तो तय समझो,
फिर भी किसी दिन अगर तुम यहाँ भूखे आओगे,
तो ये खुली बाहों से तुम्हे बुलाएँगे,
क्यूंकि इनका सच तुम्हारे सच से अलग है...

- अनुभव

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