उस एक अमर कठिनाई का कुछ और ज़रा विस्तार करो,
जिसमे लय हो कर के तुम हर दिन ही तो कुछ भूल गए,
कुछ भूली बीती बातों का वर्णन तो एक बार करो,
या मृगत्रिष्णा में तुम अपने ऊपर से ही झूल गए
क्या मायावी वो चाहत थी की मिट्टी को अंगार किया
और लगे महल तुम कहीं बनाने, ले हाथो में धूल गए,
अपने छोटे से घर में तुमने साहस का आहार लिया,
पर शायद साहस की रोटी लालच में तुम तूल गए,
कहीं तुम्हारी चाहत है ये कुछ लोगो ने तुम्हे कहा,
पर तुम अपनी चाहत में उन सबको बिलकुल भूल गए,
औजार लिए वो हाथ तुम्हारा कील कहीं है ठोक रहा,
पर तुम उसके नीचे सी ये हाथ हटाना भूल गए...
- अनुभव
Wednesday, October 14, 2009
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