मै दिन का शोर, तुम शांत भोर,
मै बहता जल, तुम ठहरे छोर,
तेरी आँखे नम मेरी हैं कठोर,
मै टुकड़ो में, तुम एक डोर,
फिर इतना आकर्षण क्यूँ है?
मेरा जाता कल, तेरा आता कल,
मै बहका सा, तुम हो अचल,
मै श्याम पट, तुम नभ धवल,
मै छाया हूँ, तुम हो असल,
फिर भी इतना आकर्षण है,
तुम हो प्रयाग, मुझपे है दाग,
मै कर की मांग, तुम सरल त्याग,
तुम घुप तिमिर, मै व्यग्र राग,
मेरे भस्म से, तुम कहती "जाग",
अब भी इतना आकर्षण है...
-अनुभव
Thursday, August 26, 2010
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